
कभी उपमहाद्वीप की किस्मत लिखने वाली East India Company का नाम एक बार फिर खबरों में है इस बार सत्ता नहीं, दिवालियापन की वजह से। 1874 में आधिकारिक रूप से समाप्त हुई कंपनी को 2010 में भारतीय मूल के ब्रिटिश कारोबारी Sanjiv Mehta ने ब्रांड के रूप में पुनर्जीवित किया था।
विडंबना देखिए जिस नाम ने कभी भारत से संपदा निकाली, वही नाम अब लंदन में अपने खर्च नहीं संभाल सका।
मेफेयर का लग्ज़री सपना, जो टिक न सका
लंदन के पॉश इलाके मेफेयर में 97 न्यू बॉन्ड स्ट्रीट पर 2,000 वर्ग फुट का स्टोर—चाय, चॉकलेट, मसाले और प्रीमियम कन्फेक्शनरी के साथ। ब्रांडिंग ऐसी कि इतिहास भी बिके और लग्ज़री भी।
लेकिन अक्टूबर 2025 में कंपनी ने परिसमापक नियुक्त कर दिए। रिपोर्ट्स के मुताबिक पेरेंट ग्रुप पर करोड़ों रुपये के कर्ज, टैक्स बकाया और कर्मचारियों की देनदारियां थीं।
आज वेबसाइट बंद है, स्टोर खाली है, और जगह किराए के लिए उपलब्ध।
नाम बड़ा, नकदी छोटी
ब्रांड वैल्यू और कैश फ्लो दो अलग बातें हैं। ईस्ट इंडिया कंपनी का नाम सुनते ही इतिहास, साम्राज्य और औपनिवेशिक प्रभाव की छवि उभरती है। लेकिन आधुनिक रिटेल बाजार में सिर्फ इतिहास से बिक्री नहीं होती।

सवाल उठता है क्या यह ब्रांड इमोशनल नॉस्टैल्जिया पर ज्यादा टिका था और बिजनेस फंडामेंटल्स पर कम?
औपनिवेशिक अतीत से कॉर्पोरेट वर्तमान तक
यह कहानी सिर्फ एक कंपनी के दिवालिया होने की नहीं, बल्कि प्रतीकों की भी है। जिस नाम ने कभी भारत की अर्थव्यवस्था को झकझोरा, वह आज वैश्विक रिटेल प्रतिस्पर्धा में खुद टिक नहीं पाया। “इतिहास की तलवार से बाजार की जंग नहीं जीती जाती।”
ब्रांड रिवाइवल आसान नहीं। खासकर तब, जब ब्रांड का अतीत विवादों और उपनिवेशवाद से जुड़ा हो। मेहता का प्रयास प्रतीकात्मक रूप से दिलचस्प था एक भारतीय के हाथ में ‘ईस्ट इंडिया कंपनी’। लेकिन बाजार भावनाओं से ज्यादा बैलेंस शीट देखता है।
कॉर्पोरेट दुनिया में अंतिम फैसला अकाउंट्स बुक देती है, इतिहास की किताब नहीं।
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